देश की 45% नॉनवेज माँग पोल्ट्री(ब्रॉयलर ) से पूरी होती है।ग्रामीण,अर्ध शहरी व शहरी क्षेत्रों में 365 दिन रोजगार उत्तपन करता है। लेकिन सरकारी नीतियों में उदासीनता, पोल्ट्री फार्मर्स के असंगठित होना इत्यादि वजह से भारी नुकसान होने की वजह से पॉल्ट्री फार्मर्स मौत को गले लगाने की तरफ बढ़ रहे है। इसके प्रमुख कारण है: 1. पोल्ट्री(ब्रॉयलर) फार्मर को पिछले 1.5-2.0 वर्ष से ब्रीडर्स कॉरपोरेट्स व शह पर ब्रीडर्स/हेचरीज़ सिंडीकेट, ब्रॉयलर चिक्स (बीज) 200-250% मुनाफा लेकर महँगा दे रहे है, और वो ही ब्रीडर्स कॉरपोरेट इंटिग्रेशन(कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग) कर पोल्ट्री फार्मर्स द्वारा बनाई गई पुरानी बाजार व्यवस्था में सस्ता उत्पाद/फसल (ब्रॉयलर) दे रहें है। अमूमन पोल्ट्री फार्मर्स को अपनी लागत से भी सस्ते दामों पर अपनी फसल(ब्रॉयलर) बेचनी पड़ रहीं है। अगली फसल में फिर मुनाफा मिलेगा उसकी उम्मीद में फिर नया फ़्लॉक तैयार करता है ओर फिर वही हश्र होता है। फार्मर कर्ज में डूबता जा रहा है। बहुत से पॉल्ट्री फार्मर्स बैंक लोन भी लिए है। बड़े व मध्यम फार्मर जो दूसरों के लिए रोजगार भी उत्तपन्न करते है बन्द हो गये या खोखले हो चुके हैं। पॉल्ट्री फार्मरअपने ही पॉल्ट्री फार्म पर इंटिग्रेशन कम्पनियों का गुलाम व मजदूर बनने को मजबूर है। ब्रॉयलर एक कच्चा उत्पाद है व इसको तैयार होने के लिए शेड में साप्ताहिक तापमान (1st-90-95°F, 2-85-90°F, 3-80- 85°F, 4-75-80°F) की जरूरत होती है । कम्पनियों द्वारा निर्धारित सीमित खर्च में पालन की बाध्यता होने से बंधुआ फार्मर्स गैर सुविधाओं वाले फार्मों में पालन करते है जिसका बाजार/मंडियों पर हमेशा बिक्री दबाव बना रहता है, स्वास्थ्यवर्धक ब्रॉयलर के पालन पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है, साथ ही कर्मचारीयों, विक्रेताओं, बंधुआ फार्मर्स व उसकी आने वाली पीढ़ियों में जबरदस्त भृष्टाचार फैला रहा है । इंटिग्रेशन का आतंक अकेले उत्तर प्रदेश में ही नहीं देश के 20 से अधिक राज्यों में व्याप्त है। पोल्ट्री फार्मर्स के असंगठित होने , इन्ही बड़े कॉरपोरेट कम्पनियों के कब्जे में व्यवसायिक व मुफीद नस्ल बीज का नियंत्रण होना मजबूरी की वजह से पोल्ट्री फार्मर्स फाँसी के फंदे की तरफ तो बढ़ रहे है लेकिन सरकार तक अपनी बात नही पहुँच पा रहे है। जयपुर में इसी महीने में अभी एक ब्रॉयलर प्रोड्यूसर ने अपनी जान की आहुति दे दी। 2. उत्तर प्रदेश में फ़ूड सेफ्टी व औषधि विभाग, फ़ूड सेफ्टी प्राधिकरण की अव्यवहारिक नियमावली का हवाला देकर, फूटकर चिकन विक्रेताओं को लाइसेंस नहीं दे रही है। उसकी आड़ में प्रशासनिक व सामाजिक संगठनों द्वारा घोर शोषण व प्रताड़ना प्याप्त होने की वजह से पोल्ट्री फार्मर्स अनावश्यक करोबारिक परेशानी महसूस करते हैं।

इसके उचित समाधान की आवाज कृषि जागरण मंच से अपेक्षित है।